पुरुष तुम जैसे नहीं होते

पुरुष तुम जैसे नहीं होते

 #Hindi Writer #

पुरुष, तुम जैसे नहीं होते हैं।
तुम सबसे अलग हो। तुम्हारा हृदय करुणा से भरा हुआ है।

क्या देखा कभी किसी पुरुष की आँख से प्रेम का आँसू टपकते?
पुरुषों का हृदय पत्थर जितना कठोर होता है,
जो पिघलना नहीं जानता।

पुरुष, तुम जैसे नहीं होते हैं।
मैंने देखा तुम्हें प्रेम में आँसू बहाते,
और देखा तुम्हारे हृदय की कोमलता को।
तुम्हें एक माँ की तरह परवाह करते हुए।

पुरुष बंजर ज़मीन से सूखे,
 सख़्त और ऊबड़-खाबड़ होते हैं,
जिन पर प्रेम के बीज गिरकर सूख जाते हैं,
वे कभी पनपते नहीं।

पुरुष, तुम जैसे नहीं होते हैं।
मैंने देखा तुम्हारे हृदय में प्रेम के पौधे को पनपते।
और तुम्हारी कोमलता में अपने दुःख के आँसू बहाते।
तुम्हारे हृदय की मिट्टी पर
ख़ुद को एक बच्चे की तरह बड़ा होते देखा मैंने।

पुरुष, तुम जैसे नहीं होते हैं।

उनके सख़्त हाथों की पकड़ अक्सर झकझोर देती है,
उनके अधिकार की सीमाएँ 
जीवन को संकुचित कर देती हैं,
उनके अहं में मैंने वजूद बिखरते देखे हैं।

पुरुष, तुम जैसे नहीं होते।

मैंने देखा तुम्हारे अपनेपन में
जीवन के भ्रम को टूटते हुए,
जीने के सलीके को बदलते हुए,
और तुम्हारे हाथ के कोमल स्पर्श से
जीवन के अहं को पिघलते हुए।

पुरुष, तुम जैसे नहीं होते हैं।
पुरुष, तुम जैसे नहीं होते हैं।

तुम बस तुम थे

तुम बस तुम थे

 #Hindi Writer#

स्मृतियों के पटल पर
तुम्हारे होने के चिन्ह रूबरू अंकित हैं।

जैसे तुमने मुझे अपनाकर
मेरे अस्तित्व को ऊपर उठाया था।
मेरे हृदय की प्रार्थना बनकर
मेरे जीवन में दस्तक दी थी।

तुम्हारा आना कोई निश्चित घटना नहीं थी,
ये बस सौभाग्य था।

तुम किसी धार्मिक ग्रंथ में लिखे
इल्म जैसे थे।

तुम रूबरू अंकित हो गए थे मेरी रूह पर,
जैसे तुम थे।

तुम-सा न पहले कभी कोई देखा था,
न तुम-सा कभी कोई मिला था।

तुम बस तुम थे।
तुमने कभी कोई और बनने की कोशिश नहीं की।
तुम जैसे थे,
वैसे ही रहे मेरे सामने।

तुम्हारा होना
बस यही सार्थक रहा मेरे लिए।

तुम्हारे होने में
मैंने सबकुछ ढूँढ़ लिया,
और फिर कुछ और पाने की चाह नहीं रही।

तुम मेरे हृदय में
मंदिर की घंटी की ध्वनि-से
बजते रहे हमेशा।

मैंने जब भी
ख़ुद को तुममें देखा,
मुझे अपनी परछाईं नज़र आए तुम।


कुछ अनकहा

कुछ अनकहा

 #Hindi Writer#

तुमने मेरा हाथ तब छोड़ा, 
जब मुझे तुम्हारी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
 जब आँसुओं की ठंडक से मेरा दिल जम गया था
 और मैं चाहती थी
 कि तुम्हारे हाथों की गर्माहट से
 मैं खुद को थोड़ा गर्म रख सकूँ।
तुमने ज़िंदगी की मजबूरियों का वास्ता दिया 
और आगे बढ़ गए। 
मैं वर्षों तक तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा करती रही। 
और एक दिन, प्रतीक्षा करते-करते
 मेरा प्रेम आँसुओं में बह गया।
तुम उन राहों पर फिर कभी नहीं लौटे।
मेरे आँसुओं की ठंडक में हम दोनों के एहसास 
और तुम्हारे किए हुए वादे,
वक़्त की परत के नीचे कहीं दब गए—
जिन्हें मैं बरसों तक ढूँढ़ती रही, 
लेकिन ढूँढ़ नहीं पाई।

कभी अलग न हुए

कभी अलग न हुए

 #hindiwriter#

पतझड़ गुज़री, सावन गुज़रा,

न जाने कितने मौसम गुज़रे,

एक तेरी यादों का मौसम बस न गुज़रा।

तुझे देखने की चाह में आँखें तरसती रहीं,

तुझे हाथ उठाकर दुआ में बस माँगा।

तू गुज़रे ज़माने-सी बात हो गया,

मेरे आज से जाने कब बीते कल में चला गया।

मुझे आस रही तेरे लौट आने की।

तेरी उपस्थिति हमेशा मेरे भीतर रही,

मेरे अस्तित्व की छाँव बनकर

मुझे ज़िंदगी की धूप से बचाती रही।

मेरे पैर जब भी जले,

तू मेरे भीतर की ठंडक बनकर मुझे बचाता रहा।

तू मिला और फिर कभी नहीं मिला,

तू जुदा हुआ और फिर कभी जुदा न हुआ।

तू मेरे हर पल में रहा।

मैं जब अकेली रही,

मेरा हाथ पकड़कर चलता रहा।

मेरी राहों के काँटों को हटाता रहा,

मेरी आँखों के आँसू पोंछता रहा।

तू उपस्थित रहा मेरे हर पल में।

तू और मैं मीलों की दूरियों पर भी

साथ जीते रहे, साथ मरते रहे।

बिना हाथ थामे हमसफ़र बने रहे,

बिना आँखों में देखे एक-दूसरे को महसूस करते रहे।

बिना बात किए एक-दूसरे के शब्द सुनते रहे।

तू—बस तू होकर तू ही रहा,

और मैं भी तेरे जैसी हो गई।

मैं भी तेरे अस्तित्व की परछाईं बनकर

तेरे साथ रही।

तू जब कमज़ोर पड़ा,

मैं भी तेरी हस्ती का सामां बनकर तेरे साथ रही।

अकेली तन्हा रातों में जब तेरी आवाज़ लड़खड़ाई,

मैं भी तेरे अंतर्मन की आवाज़ बनकर तेरे साथ रही।

हम दोनों मीलों के फ़ासलों पर भी एक रहे।

हम बिछड़े भी,

तो फिर कभी अलग न हुए।

अलग न हुए।