तुम बस तुम थे
#Hindi Writer#
स्मृतियों के पटल पर
तुम्हारे होने के चिन्ह रूबरू अंकित हैं।
जैसे तुमने मुझे अपनाकर
मेरे अस्तित्व को ऊपर उठाया था।
मेरे हृदय की प्रार्थना बनकर
मेरे जीवन में दस्तक दी थी।
तुम्हारा आना कोई निश्चित घटना नहीं थी,
ये बस सौभाग्य था।
तुम किसी धार्मिक ग्रंथ में लिखे
इल्म जैसे थे।
तुम रूबरू अंकित हो गए थे मेरी रूह पर,
जैसे तुम थे।
तुम-सा न पहले कभी कोई देखा था,
न तुम-सा कभी कोई मिला था।
तुम बस तुम थे।
तुमने कभी कोई और बनने की कोशिश नहीं की।
तुम जैसे थे,
वैसे ही रहे मेरे सामने।
तुम्हारा होना
बस यही सार्थक रहा मेरे लिए।
तुम्हारे होने में
मैंने सबकुछ ढूँढ़ लिया,
और फिर कुछ और पाने की चाह नहीं रही।
तुम मेरे हृदय में
मंदिर की घंटी की ध्वनि-से
बजते रहे हमेशा।
मैंने जब भी
ख़ुद को तुममें देखा,
मुझे अपनी परछाईं नज़र आए तुम।
कुछ अनकहा
#Hindi Writer#
कभी अलग न हुए
#hindiwriter#
पतझड़ गुज़री, सावन गुज़रा,
न जाने कितने मौसम गुज़रे,
एक तेरी यादों का मौसम बस न गुज़रा।
तुझे देखने की चाह में आँखें तरसती रहीं,
तुझे हाथ उठाकर दुआ में बस माँगा।
तू गुज़रे ज़माने-सी बात हो गया,
मेरे आज से जाने कब बीते कल में चला गया।
मुझे आस रही तेरे लौट आने की।
तेरी उपस्थिति हमेशा मेरे भीतर रही,
मेरे अस्तित्व की छाँव बनकर
मुझे ज़िंदगी की धूप से बचाती रही।
मेरे पैर जब भी जले,
तू मेरे भीतर की ठंडक बनकर मुझे बचाता रहा।
तू मिला और फिर कभी नहीं मिला,
तू जुदा हुआ और फिर कभी जुदा न हुआ।
तू मेरे हर पल में रहा।
मैं जब अकेली रही,
मेरा हाथ पकड़कर चलता रहा।
मेरी राहों के काँटों को हटाता रहा,
मेरी आँखों के आँसू पोंछता रहा।
तू उपस्थित रहा मेरे हर पल में।
तू और मैं मीलों की दूरियों पर भी
साथ जीते रहे, साथ मरते रहे।
बिना हाथ थामे हमसफ़र बने रहे,
बिना आँखों में देखे एक-दूसरे को महसूस करते रहे।
बिना बात किए एक-दूसरे के शब्द सुनते रहे।
तू—बस तू होकर तू ही रहा,
और मैं भी तेरे जैसी हो गई।
मैं भी तेरे अस्तित्व की परछाईं बनकर
तेरे साथ रही।
तू जब कमज़ोर पड़ा,
मैं भी तेरी हस्ती का सामां बनकर तेरे साथ रही।
अकेली तन्हा रातों में जब तेरी आवाज़ लड़खड़ाई,
मैं भी तेरे अंतर्मन की आवाज़ बनकर तेरे साथ रही।
हम दोनों मीलों के फ़ासलों पर भी एक रहे।
हम बिछड़े भी,
तो फिर कभी अलग न हुए।
अलग न हुए।