“काश तुम हमारे होते”
ज़िंदगी की धूप में जलते मेरे पैरों के नीचे,
काश पैर तुम्हारे होते।
अपनेपन की ठंडक में
यह ताप सहना थोड़ा तो आसान होता।
मजबूरियों की राहों में
हमराही बनकर तुम
रास्तों को आसान कर देते।
ऊबड़-खाबड़ से पथ पर
परेशानियों के चुभते काँटों को निकालने के लिए,
काश हाथ तुम्हारे होते।
तुम्हारे कोमल हाथों के स्पर्श से
तकलीफ़ों का बहता हुआ ख़ून
शायद थोड़ा धीमा पड़ जाता।
वक़्त से बिछुड़े हुए,
आशाओं के टपकते हुए आँसू लिए,
बंद आँखों को जब भी खोलते,
काश दृश्य तुम्हारे होते।
किस्मतों की तिजोरी में,
हाथों की लकीरों में,
काश हाथ तुम्हारे होते।
काश...
तुम सबके होकर भी
बस हमारे होते।
