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धूप और छाँव

#धूप और छाँव#

#Life Story#

ऐसा लगता है ज़िंदगी धूप और छाँव के बीच चल रही है।

छाँव की तलाश में मैं जिस ओर भी कदम बढ़ाती हूँ,

वह छाँव वहीं से मेरे कदमों के पीछे लौट जाती है।

मानो ईश्वर मेरे पाँव इस जीवन की धूप में जलाना चाहता है।

उसके ताप को सहते हुए, खामोश मैं आगे बढ़ती जाती हूँ।

उम्मीदों की रोशनी जैसे धुंधली हो गई है,

ज़िंदगी का दीपक बुझने की कगार पर है…

फिर भी कुछ है जो मुझे संभाले रखता है—

मेरा हौसला, मेरी खामोशी,

और मेरे अंतरमन में जलता उम्मीदों का दीपक।

ज़िंदगी उतनी कठिन भी नहीं,

पर उतनी आसान भी कहाँ है…

लू के थपेड़ों सा अकेलापन चारों ओर घेर लेता है,

और शब्द जैसे खुद ही खामोश रहना चाहते हैं।

अब कुछ कहना व्यर्थ सा लगता है,

शब्दों का बखान अर्थहीन प्रतीत होता है।

शायद अर्थ तो इसमें छुपा है—

कि बस चुप रहा जाए,

और ज़िंदगी का दर्शक बना जाए।

छाँव की ओर भागना नहीं,

धूप में खड़े रहकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करना है।

वक़्त बदलता है—

कभी शोर मचाकर,

तो कभी खामोशी से।

दिल के उस दीपक को जलाए रखना ज़रूरी है,

क्योंकि बिना उम्मीदों के जीवन चलता नहीं।

अंतरमन की रोशनी के बिना

संघर्षों में टिके रहना आसान नहीं होता।

मेरा हौसला, मेरी ताकत—सब कुछ मेरे भीतर है,

फिर भी मैं उसे बाहर ढूँढती हूँ।

जो दृश्य होते हुए भी अदृश्य है,

उसे मैं बाहरी दुनिया में खोजती हूँ।

जो भीतर है, उसे बाहर ढूँढना व्यर्थ है…

पाँव धूप में जलते हैं,

और ज़िंदगी मुझे परीक्षा के अंतिम पड़ाव तक

अकेले ही लेकर चलती है।

लोग मेरे आसपास होते हैं,

पर मैं फिर भी अकेली हूँ।

और जो आसपास भी नहीं,

वह हर जगह है—

वह सर्वत्र है, वह मुझमें है।

हौसलों के पंख झुलसते हैं,

फिर भी मैं उन्हें फैलाए रखती हूँ,

खुद की रक्षा करती हूँ।

मेरा अस्तित्व ही मेरी पहचान है,

मेरा होना ही मेरे होने का प्रमाण है।

मैं हूँ… और रहूँगी—

क्योंकि मुझे अपने होने पर विश्वास है।

ज़िंदगी जैसी भी हो,

वक़्त जैसा भी हो—

मैं वक़्त से आगे बढ़ जाऊँगी,

और एक दिन…

मैं अपनी छाँव तक पहुँच जाऊँगी। 



तुम मेरी जिन्दगी की आवाज हो

"तुम्हारी खामोशी अब मुझे परेशान करने लगी है,
ऐसा लगता है तुम मेरी जिंदगी की आवाज हो।"
ख़ामोशी का दर्द




कहाँ हो तुम,ऐसे तुम्हारा चुप रहना,अब बहुत परेशान कर देता है।
कहा था ना मैंने तुमसे,तुम्हारा साथ होना ही काफी है।
पर तुम जैसे कभी नहीं समझ पाओगे।
तुम्हारी वो मीठी सी मुस्कान जिसको देखने भर से
मेरी जिंदगी के सारे गम दूर हो जाते है।
कहाँ महसूस कर पायीं हूँ मैं उसे एक अरसे से।
तुम्हारे ना होने से बस यूँ लगता है -




"तुम साथ हो तो यूँ लगता है,कि ये
सारी खुदाई मेरे साथ है।
तुम ना हो तो फिर मैं ही कहाँ रह पाती हूँ
खुद के साथ।"







"जिन्दगी इतनी बड़ी भी नही ,
कि तुमको यूँ नाराज करके छोड़ दू।
क्या खबर ये फिर कभी मनाने का मौका
भी देगी या नहीं।"




वो मेरी और तुम्हारी आखिरी मुलाकात जिसमें
तुमने कहा था,,कि मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।
कभी कभी वो मेरी आँखों में आँसू ले आती है।
ये दिल कहता है कि तुम कभी झूठ नही बोलते,
तो फिर आज इतनी बेरूखी क्यों?




"तुमको झूठा कहने का हक तो इस दिल ने
मुझको भी नहीं दिया।
पर आज तुम्हारी सच्चाई इस बेरूखी के
आगे बेजुबान है।"




कभी कभी तुम्हारी खामोशी इतना परेशान
कर देती है,जैसे मैं गुनाहगार हूँ इसकी।
तुम आज मुझसे खफा हो।
मेरी ज़िन्दगी का सारा शोर तुम्हारी खामोशी
ने समेट लिया है।
अब तो यूँ लगता है,जैसे तुमसे मिलने के
बाद मैं भी मैं ना रही।तुम क्यों भूल गए हो
मैनें तुमसे कहा था ना-




"तुम तो तुम हो ही,मैं भी तो तुम हूँ
मैं भी तो तुम हूँ।
तुम ना हो तो,फिर मैं कहाँ,तुम ना हो
तो फिर मैं कहाँ??"




"काश एक सुबह ऐसी भी आये,
तेरे आने की खुशी मे ये आँखें आँसू गिराये।"




"काश लौटा दो तुम मुझे मेरी जिन्दगी के शब्द,
क्योंकि तुम्हारी खामोशी अब परेशान करती है,
ऐसा लगता है तुम मेरी जिंदगी की आवाज हो।"




"ऐसा लगता है तुम मेरी जिंदगी की आवाज हो।
ऐसा लगता है तुम मेरी जिंदगी की आवाज हो।"


Zla India-आपके दिल की आवाज़ /हमेशा जुड़े रहिए कहानियों और कविताओं के साथ, जिनके नायक होंगें आप /आपके दिल की आवाज़, कुछ एहसास जो छू ले दिल को.....